fomative sumative

 



























Sr. No.

Title

Page No.

Remark’s

1.


संरचनात्मक एवं योगात्मक मूल्यांकन

03



2.


संरचनात्मक मूल्यांकन


04-05



3.


संरचनात्मक मूल्यांकन के उद्देश्य


06


4.


संरचनात्मक मूल्यांकन के गुण एवं दोष


06-08

5.


योगात्मक मूल्यांकन


09-10

6.


योगात्मक मूल्यांकन के गुण

10

7.



योगात्मक मूल्यांकन के दोष


11

8.


संदर्भ ग्रंथ सूची


12

9.

धन्यवाद


13







संरचनात्मक एवं योगात्मक मूल्यांकन

(Formative and Summative Evaluation)


शैक्षिक मूल्यांकन का अंतिम लक्ष्य शिक्षा में सुधार लाना है। मिचेल स्क्रीवेन (Miachel Scriven) ने सन् 1967 में मूल्यांकन की चर्चा करते हुए मूल्यांकन को दो भागों में विभाजित किया है। शैक्षिक मूल्यांकन दो प्रकार की भूमिकाएं अदा करता है -



(i) संरचनात्मक भूमिका

(ii) योगात्मक भूमिका



इसी आधार पर स्क्रीवेन ने निम्नलिखित दो प्रकार के मूल्यांकन का उल्लेख किया है -



1. संरचनात्मक मूल्यांकन या रचनात्मक मूल्यांकन ( Formative Evaluation)

2. योगात्मक मूल्यांकन या संकलनात्मक मूल्यांकन ( Summative Evaluation)







  1. संरचनात्मक मूल्यांकन या रचनात्मक मूल्यांकन (Formative Evaluation) :-

संरचनात्मक मूल्यांकन से तात्पर्य ऐसे मूल्यांकन से है जिसके आधार पर शैक्षिक कार्यक्रम,शिक्षण विधि, पाठ्यक्रम, शिक्षण अपने शैक्षिक कार्यक्रम, शिक्षण विधि आदि कि गुणवत्ता, प्रभावकारिता तथा उपयोगिता का आंकलन इसीलिए करता है, कि उस शैक्षिक कार्यक्रम, शिक्षण विधि को और अधिक उत्तम, प्रभावशाली तथा उपयोगी बनाया जा सके।



इससे यह भी स्पष्ट होता है, कि संरचनात्मक मूल्यांकन इसलिए करना आवश्यक है, जिससे किसी निर्माणधीन शैक्षिक कार्यक्रम, शिक्षण प्रविधि को अंतिम रूप से पूर्व उसमें आवश्यक संशोधन या परिमार्जन किया जा सके।

उदाहरणार्थ _ किसी कक्षा के छात्रों के लिए किसी विषय का पाठ्यक्रम निर्माण करते समय उसके प्रारंभिक प्रारूप(Preliminary draft) का मूल्यांकन इस दृष्टि से किया जाता है कि उसको अंतिम रूप देने के पूर्व इसमें वांछित सुधार किया जा सके।

इसी प्रकार यदि किसी नवीन शिक्षण -विधि का विकास करना है, तो शिक्षक उस शिक्षण विधि का प्रयोग सर्वप्रथम छात्रों के प्रतिनिधि -समूह (न्यायदर्श ) पर करता है और इस प्रकार प्राप्त आंकड़ों के मूल्यांकन द्वारा वह इस निष्कर्ष पर पहुंचने का प्रयास करता है कि नवीन शिक्षण विधि उन छात्रों के लिए कितनी सार्थक एवं उपयोगी है।

प्राप्त आंकड़ों के मूल्यांकन एवं विश्लेषण से शिक्षक को प्रतिपुष्टि (Feed -Back) प्राप्त होती है, जिसके आधार पर शिक्षण विधि में आवश्यक संशोधन तथा परिमार्जन किया जाता है।

अतः स्पष्ट है कि, संरचनात्मक मूल्यांकन का मुख्य उद्देश्य तैयार किए जा रहे शैक्षिक कार्यक्रम, पाठ्यक्रम, नवीन शिक्षण विधि की कमियों को इंगित करना तथा उसमें सुधार करने के उपाय बताना है।



प्रायः देखा जाता है, कि शिक्षक अपने कक्षा-शिक्षण के दौरान छात्रों से प्रश्न करता रहता है। ये प्रश्न छात्र को किसी पाठ को सीखने मे सहायक होते है और शिक्षण को रुचिकर एवं सजीव बनाते हैं। इन्हें शिक्षण-प्रश्न (Teaching questions) की संज्ञा दी गई है। पाठ की किसी इकाई का शिक्षण समाप्त करने के बाद शिक्षक, छात्रों के समक्ष कुछ ऐसे प्रश्नों को प्रस्तुत करता है, जिससे उसे यह जानकारी हो सके कि छात्रों ने उस इकाई (विषय) को कितना सीखा है इसमें शिक्षक को यह जानकारी हो जाती है ,की उसकी शिक्षण -विधि कितनी प्रभावशाली है।



अतः इससे शिक्षण प्रतिपुष्टि (Feed-back) प्राप्त करके अपनी पूर्ववर्ती शिक्षण विधि में अपेक्षित परिवर्तन करता है। अतः शिक्षक जब कक्षा में शिक्षण कार्य करते समय सीखने वाले छात्रों की उपलब्धि का मूल्यांकन प्रश्नों द्वारा करता है , तो इसे सरंचनात्मक मूल्यांकन कहते है।



  • संरचनात्मक मूल्यांकन के उद्देश्य (Objectives of Formative Evolution)

संरचनात्मक मूल्यांकन के उद्देश्य निम्न है :-

  1. धनात्मक अभिप्रेरित विश्वास तथा आत्मसम्मान को प्रोत्साहित करना।



  1. शिक्षकों को इसके द्वारा पृष्ठपोषण प्रदान करना।





  1. शिक्षक को सूचनाएं प्रदान करना ताकि शिक्षण में सुधार किया जा सके।



  1. इसके द्वारा छात्रों को उच्चस्तर की शिक्षा देना।





(5) विद्यार्थियों को ज्ञानात्मक स्तर के सुधार के तरीके बताना।



  • संरचनात्मक मूल्यांकन के गुण (Advantages of Formative Evolution)



संरचनात्मक मूल्यांकन के गुण निम्न है

  1. इसके द्वारा अध्यापक सामूहिक तथा व्यक्तिगत दोनों ही रूप परीक्षा का निर्माण छात्रों के लिए कर सकता है।



  1. इससे विद्यार्थी स्व-अधिगम के लिए तैयार होते है।





  1. इसके द्वारा शिक्षक यह जानने में सक्षम होते है कि बालक का अर्जित ज्ञान कितना है।



(4) विद्यार्थी और अधिक सीखने के लिए अभिप्रेरित होते है।

(5) शिक्षक छात्रों को उनकी उन्नति के विषय में बता सकते है जो उन्हें लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायक होते है।



(6) शिक्षक के साथ -साथ मूल्यांकन का लाभ भी विद्यार्थी उठाते है।



(7)शिक्षक इसके द्वारा यह निश्चित करता है कि उसे निर्देश में क्या परिवर्तन करने है ताकि सभी बालक उसे समझ कर आगे बढ़ सकें।



(8)विद्यार्थी बहुत से जीवन सम्बंधी कौशल को सीखते हैं, जैसे - स्व -मूल्यांकन (Self - Evaluation), स्व - आंकलन (Self - Assessment), लक्ष्यों को निर्धारित करना आदि हैं।



  • संरचनात्मक मूल्यांकन के दोष (Demerits of Formative Evaluation)



संरचनात्मक मूल्यांकन के दोष निम्न लिखित हैं :-

  1. इसका क्षेत्र अत्यन्त संकुचित है।



  1. व्यक्तित्व के सभी पक्षों का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता है।





  1. इस विधि के आधार पर छात्रों के विषय में ठोस निष्कर्ष नहीं लिया जा सकता है।



  1. बालक की विचार शक्ति का मूल्यांकन करना सरल नहीं है।





(5) प्रारंभिक स्तर के मूल्यांकन द्वारा ही छात्र के भविष्य की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है।





















  1. योगात्मक मूल्यांकन या संकलनात्मक मूल्यांकन ( Summative Evaluation) :-

योगात्मक मूल्यांकन का अर्थ किसी पूर्व - विकसित शैक्षिक कार्यक्रम, पाठ्यक्रम, शिक्षण-विधि, शिक्षण सामाग्री की उपयुक्तता की जाँच करना है। इससे स्वीकृत शैक्षिक कार्यक्रमों, शिक्षण विधियों आदि को जारी रखने के सम्बंध में निर्णय लिया जा सकता है। उदाहरण के लिए, माना हाइस्कूल कक्षा के छात्रों के लिए विज्ञान की पुस्तक का चयन करना है, तो इसके लिए हाइस्कूल के विज्ञान पाठ्यक्रम पर लिखी ऐसी

सभी पुस्तकों का मूल्यांकन करना होगा।



इन पुस्तकों में से उसी पुस्तक का चयन किया जायेगा, जो शैक्षणिक उद्देश्य तथा पाठयक्रम आदि की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ होगीं। यहाँ पर पूर्व लिखित पुस्तकों का योगात्मक मूल्यांकन (Summative Evaluation) किया जायेगा। इस परिस्थिति में विभिन्न लेखकों अथवा प्रकाशकों द्वारा प्रस्तुत उक्त पुस्तकों में सुधार अथवा संशोधन करना संभव नहीं है। इसी प्रकार यदि हम किसी कक्षा के लिए पूर्व निर्धारित प्रवेश प्रकिया शिक्षण-कार्यक्रम, परीक्षा - पद्धति आदि की वांछनीयता का आंंकलन करना चाहते है, जिससे उसे हम आगामी वर्षो में भी जारी रख सकें तो इसके लिए योगात्मक मूल्यांकन करना आवश्यक होता है ।

अध्यापक अपने कक्षा- शिक्षण के दौरान जब छात्रों के प्रश्न पूछता है, तो उसका उद्देश्य यह होता है, की वह छात्रों की अववोध की जानकारी करते हुए उनके ज्ञानात्मक स्तर में सुधार कर ले, जिससे छात्र उपलब्धि अधिकतम हो सके इसे संरचनात्मक मूल्यांकन कहते है।

परंतु अध्यापक के लिए यह भी आवश्यक है, कि वह अपने कक्षा के छात्रों की उपलब्धि का मूल्यांकन करके उन्हें अगले पाठ को सीखने के लिए दिशा-निर्देश प्रदान करें। इसके अतिरिक्त वह अपनी कक्षा के छात्रों की समग्र उपलब्धि के मूल्यांकन के उपरांत उन्हें अगली कक्षा में प्रोन्नति प्रदान करना चाहता है। तो यह योगात्मक मूल्यांकन कहलाता है।



  • योगात्मक मूल्यांकन के गुण(Merits of Summative Evaluation) :-



इसके निम्नलिखित गुण है :-

(1) इसका मुख्य उद्देश्य किसी पूर्व निश्चित शिक्षा नीति, विधि की जाँच करके उसके विषय में निर्णय लेना है।



(2)इसमे सूचना एकत्रित करने के लिए वैध एवं विश्वसनीय उपकरणों का प्रयोग होता है।



(3)यह व्यापक मूल्यांकन प्रक्रिया है।



(4)इसके द्वारा छात्रों के एक स्तर का भी मूल्यांकन भी किया जाता है।



  • योगात्मक मूल्यांकन के दोष (Demerits of Summative Evaluation)



इसमें निम्नलिखित दोष है :

(1) इसमे धन अधिक व्यय होता है।



(2) यह मूल्यांकन प्रक्रिया प्राथमिक स्तर पर कम प्रभावशाली है।









-: संदर्भ ग्रंथ सूची :-


डॉo पाण्डेय नितिन कुमार, डॉo मनोज मिश्र, शिक्षा में मापन एवं मूल्यांकन, साहित्य प्रकाशन, आगरा - 282003

(पृo संo - 106,107)



डॉo सिंह संजीव कुमार, धीरेंद्र कुमार सिंह, पाठ्यचर्या के सैद्धांतिक आधार, साहित्य प्रकाशन, आगरा - 282003

(पृo संo - 103-105)








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